बेहतर
उठे सुबह तो नींद किसी की बेहतर थी,
किसी की शकल, किसी के कपड़े तो जूते किसी के बेहतर थे।
किसी की सेहत थी बेहतर, तो किसी की नौकरी तुमसे बेहतर थी।
किसी का बैंक अकाउंट तो रिश्ता किसी और का बेहतर था।
सब कुछ न था किसी का भी बेहतर, फिर भी इसी भ्रम में रह गए
कि दुनिया है बेहतरीन और तुम रह गए बेकार।
दिन गुजर गया इसी बेहतरीन दुनिया को देखते देखते,
फिर चले गए सोने इस उम्मीद को ले कर कि बनाना है खुद को और भी बेहतर,
ताकि टिक सके इस बेहतरीन दिखती दुनिया में!